वासुदेव बलवंत फड़के देश का पहला क्रांतिकारी जिसका नाम सुनते ही अंग्रेज पेंट में ही मूत देते थे ! जरुर पढ़ें शहीदों की अनसुनी दास्ताँ !

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वासुदेव बलवंत फड़के

भारत माँ के सच्चे सपूत थे हुतात्मा वासुदेव बलवंत फड़के ,जिनका नाम सुनते ही अंग्रेज थर थर कांपते थे |

वासुदेव बलवंत फड़के ऐसे पहले क्रन्तिकारी थे जिन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का संगठन बनया था | भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की क्रांति की असफलता के बाद भारत में अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा होने से जब हर कोई दर रहा था तो वासुदेव बलवंत फड़के जी ने  ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का संगठन बनया था |

जन्म और आरंभिक जीवन :

वासुदेव बलवंत फड़के का जन्म 4 नवंबर, 1845 को महाराष्ट्र के रायगड जिले के शिरढोणे गांव में हुआ था प्राथमिक शिक्षा पाने के बाद इनके पिताजी ने फडके जी को एक दुकान पर काम करने के लिये बोला लेकिन फडके जी इन सब से दूर मुंबई आ गये |

क्रन्तिकारी जीवन और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह :

उन्होंने जंगल में एक अभ्यास स्थल बनाया, जहां ज्योतिबा फुले और लोकमान्य तिलक भी उनके साथी थे. यहां लोगों को हथियार चलाने का अभ्यास कराया जाता था | उन्होंने आदिवासियों की सेना भी संगठित की |  धीरे धीरे महाराष्ट्र के सात जिलों में वासुदेव फड़के का प्रभाव फैलने  लगा | उनकी क्रन्तिकारी गतिविधियों से अंग्रेज अफसर इतना  डर गए थे कि कहा जाता है कि उनका नाम सुनते ही अंग्रेज थर-थर कांपते थे और उनका मुकाबला करने का साहस किसी भी अंग्रेज ऑफिसर में नहीं था |

पकड़ा जाना और काले पानी की सजा:

20 जुलाई, 1879 को फड़के बीमारी की हालत में एक मंदिर में आराम कर रहे थे. उसी समय उनको गिरफ्तार कर लिया गया |उनके खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया और कालापानी की सजा देकर अंडमान भेज दिया गया | 17 फरवरी, 1883 को कालापानी की सजा काटते हुए जेल के अंदर ही देश का वीर सपूत शहीद हो गया |