मरते दम तक नेहरु को डर सताता रहा कि कंही नेताजी कहीं से प्रकट न हो जाएँ और उनसे सत्ता न ले लें | जानिए क्यों नेताजी सुभाष से इतना डरते थे नेहरु

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the reasons why nehru always dislike netaji

The reasons why Nehru always dislike Netaji नेताजी सुभाष चन्द्र बोस से खुद को हमेशा असुरक्षित अनुभव करते थे जवाहरलाल नेहरु इसमें कोई शक नही कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस देश की जनता में नेहरु से कहीं अधिक लोकप्रिय थे| यही कारण है कि नेहरु के मन में हमेशा से ही सुभाष को लेकर हीन-भावना बनी रही| नेहरु को लगता था कि सुभाष के रहते उनका कद कभी ऊँचा नही बन सकता| इसलिए वे (नेहरु) नेताजी से खुद को असुरक्षित अनुभव करते रहे| नेहरु को प्रधानमंत्री बनने के बाद भी यही डर जीवन भर सताता रहा कि एक दिन नेताजी कहीं से देश के सामने प्रकट हो जायेंगे और उन्हें सत्ता से हाथ धोना पड़ेगा|

नेताजी से अपने इसी फोबिया के चलते नेहरु ने नेताजी के परिवार के सदस्यों की जासूसी करवाई| उनके परिवार से जुड़े हर सदस्य की कर गतिविधि की ख़ुफ़िया जानकारी सीधे नेहरु को भेजी जाती थी| और यह गन्दा खेल नेहरु की मौत के बाद तक होता रहा|

नेताजी के भतीजे अमिया नाथ बोस जब 1957 में जापान गये तो   नेहरु के मन में तरह-तरह की शंकाएं उठने लगी| उन्होंने टोक्यो में   मौजूद    भारतीय राजदूत की ड्यूटी लगाई कि पता करे अमिया नाथ बोस यहाँ क्या करने आया है| उनकी हर गतिविधि की जानकारी उन्हें दी जाये| और वो कहाँ-कहाँ जाता है,  किस-किस से मिलता है इस बात की भी निगरानी की    गयी|

हालाँकि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस नेहरु का व्यक्तिगत तौर पर बहुत सम्मान करते थे| उनके नेहरु को लिखे पत्रों से जानकारी प्राप्त होती है कि नेताजी उनकी व्यक्तिगत जिंदगी के बारे में भी बहुत से सवाल पूछते थे| एक पत्र में वो नेहरु की बेटी इंदिरा के बारे में पूछ रहे हैं कि “इंदु (इंदिरा जी के बचपन का नाम) कैसी?” वह स्वीटजरलैंड में अकेला तो महसूस नहीं करती?  नेताजी के पंडित नेहरु को 30 जून 1936 से लेकर फरवरी 1939 तक पत्र भेजने के रिकार्ड उपलब्ध हैं| सभी पत्रों में नेताजी ने नेहरु जी के प्रति बेहद आदर का भाव दिखाया है|

लेकिन आखिर नेताजी को समझ आ गया कि नेहरु उनसे नफरत करते हैं, ऐसा उनके नेहरु को लिखे आखिरी प्रत्र में उनकी भाषाशैली को देखकर पता चलता है| सुभाष जी लिखते हैं -” मैं महसूस करता हूं कि आप (नेहरु जी) मुझे बिल्कुल नहीं चाहते|”

जब दुबारा कांग्रेस अध्यक्ष चुने गये नेताजी

जब 1939 में त्रिपुरी में हुए कांग्रेस अधिवेशन में नेताजी दुबारा कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये तो नेहरु और गाँधी को उनकी लोकप्रियता पर कोई शाक नही रह गया क्योंकि उन्होंने गाँधी जी के खास डा. पट्टाभी सीतारमैय्या  को करारी मात दी थी| लेकिन उन्हें ये पद क्यों छोड़ना पड़ा इस बात से पूरा देश वाकिफ है| गांधी जी को नेताजी का दुबारा अध्यक्ष बनना बिलकुक पसंद नही आया | और गाँधी की इस सोच में नेहरु भी शामिल थे | हालाँकि, देशभर के प्रतिनिधियों का प्रचंड बहुमत नेता जी के साथ खड़ा था|

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जब नेताजी अपनी आज़ाद हिन्द फौज के साथ बर्मा में मणिपुर के रास्ते भारत में प्रवेश कर रहे थे थे तो उस समय  गुवाहाटी में एक सभा में नेहरु ने कहा था -‘यदि सुभाष ने अपनी    सेना के साथ आज़ाद करवाने के लिए  भारत पर आक्रमण किया तो तो वो    खुद (नेहरु) उनसे दो-दो हाथ करेंगे| तो अंदाज़ा लगाये कितनी नफरत करते थे नेहरु नेता    जी से | नेहरु को पता था कि सुभाष के रहते उन्हें    देश की जनता सत्ता के आसपास तक फटकने तक नही देगी |